शाश्वत सत्य – The absolute truth poem

शाश्वत सत्य – The absolute truth poem. A true Poem, the absolute truth, poem of death, an eye opening poem. A Poem of death.

मैं आऊंगा, मैं शाश्वत हूँ
मैं अचल हूँ, मैं अटल हूँ
मैं कल्कि नहीं, जो भ्रम में रहो
मैं प्रलय नहीं, जो ज्ञात न हो
वो बात नहीं, जो सोच रहे
मैं वस्तु नहीं, जो ढूंढोगे
मैं साथ जन्म के आया हूँ
मैं जन्म से साथ में चलता हूँ
मेरा नाम सुना होगा
जाने अनजाने सुना होगा
ज्ञात हूँ मैं, अज्ञात नहीं
मुझको कोई पश्चाताप नहीं
मेरी यही प्रकृति है
मेरी यही नियति है
मैं निश्छल हूँ और पाप रहित
मैं ही एक संताप रहित
मैं सब छीन ले जाऊँगा
जो संचय किया होगा तुमने
तुम सब छोड़ के आओगे
जब मैं लेने आऊंगा
तुम सोच रहे मैं शत्रु हूँ
नहीं मित्र मैं मृत्यु हूँ
A Poem by Nitesh Sinha
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I will come, I am absolute. I am firm, I am stable. I am not Kalki that you can argue about. I am not the judgement day that you are not sure about. I am not an object to be found. I am there. I am there with your existence.

I will take whatever you have accumulated and that does not mean that I am doing something wrong. When you come with me, you will leave everything. This is my basic nature and I do not have any regrets for the same.

If you think, I am your enemy. You are wrong my friend, I am DEATH.

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