है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है
है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है । यह कविता भारत के प्रसिद्ध कवि डा. हरिवंशराय बच्चन द्वारा लिखी गई है। इस कविता मे कवि ने निराशा की घड़ी मे आशा की किरन जगाने की प्रेरणा दी है। कवि यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर कोई आशा टूट जाती है या कोई मुश्क़िल समय चल रहा हो तो आशा की किरण जगाने मे कोई मनाही नही है।

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

पहला भाग

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

तुमने अपनी कल्पना मे एक सुंदर मंदिर बनाया। तुम्हारी कल्पना का वह मंदिर कमनीय अर्थात बहुत सुंन्दर और मनमोहक था। तुमने अपनी भावनाओ के हाथों से अर्थात बड़े प्यार से उसके एक एक हिस्से को बनाया था। तुमने अपने सपनों मे जिसे पूरी चाहत से सजाया था। तुम्हारी कलपना ने जो उसमे रंग भरे थे, वो स्वर्ग के दुष्प्राप्य अर्थात लगभग असंभव (सरलता से नहीं प्राप्त होने वाले) रंग थे।

वो सपनो का सुन्दर महल अगर टूट गया, तो ईंट, पत्थर और कंकड़ जोड़ कर एक कुटिया (साधारण सा घर) बनाना, जिसमे शांति से रह सको, कब मना है।

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है।

दूसरा भाग

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

एक ऐसा पात्र (बर्तन) जो उस आकाश से बना हो, जिसे बादलों ने अपने अश्रु से धोया हो। अर्थात, बारिश के बाद जैसा आकाश नीला और साफ हो जाता है, उसके टुकड़े से बना पात्र या असके जैसा निर्मल पात्र जो सुंदरऔर मनमोहन हो। और उस पात्र मे ऐसी मदिरा हो जैसे सुबह की लाली का लाल रंग होता है। और जैसे सुबह की किरणें नये बादलों से चमचमाती आती, वैसी चमचमाती मदिरा, उस सुंदर से पात्र में है।

ऐसा सुंदर पात्र अगर टूट गया, तो पश्चाताप करने से कुछ नही होगा। अगर वैसा पात्र टूट गया, तो दोनो हाथों को मिलाकर, एक निर्मल झरने या पानी के श्रोत से प्यास बुझाने मे कब मना है।

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है।

तीसरा भाग

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

एक समय था जब किसी चीज़ की परवाह नहीं थी, किसी बात की चिंता नहीं थी। कालिमा अर्थात घनघोर अँधेरा तो दूर की बात है, कोई परछाई भी आँखों के सामने नहीं थी। घनघोर अँधेरा यानि कोई बड़ी परेशानी तो दूर की बात है, छोटी चिंता भी नहीं थी। जब आँखों से और बातों से मस्ती टपकती थी, अर्थात, जब सिर्फ मस्ती और आनंद की बात होती थी, मन में सिर्फ प्रसन्नता और आनंद था। उस प्रसन्नता में ऐसी हंसी जिसके आगे बादलों की आवाज़ भी धीमी थी। वो आनंद का समय चला गया, वो हंसी चली गयी, और अपने साथ ख़ुशी के सारे कारण भी ले गयी।
लेकिन हम सब जानते हैं की समय हमेशा एक सा नहीं रहता, और समय के इस अधीरता, अर्थात, समय के बदलने की प्रकृति पे, मुस्कुराना कब मना है।

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है।

चौथा भाग

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

एक ऐसा समय भी था जब किसी सनक में, मन के अंदर एक गीत जागा था। उस गीत के पागलपन में, वैभव और सुख से भी आँखें फेर ली, और जो भी वरदान माँगा, उस गीत के लिए माँगा । उस गान की आवाज़ जो मन से निकल कर दूसरों के मन तक पहुंची। उस पागलपन में गाये गीत ने अम्बर यानि आकाश और अवनि यानि धरती को अपनी आवाज़ से भर दिया था। अब वो पागलपन, और वो पागलपन का गीत ख़तम हो गया है। अब वो गाने की सनक समाप्त हो चुकी है। फिर भी मन को बहलाने के लिए, एक अधूरी पंक्ति को गाना कब मना है?
भले वो अधूरी पंक्ति आकाश और धरती को पहले जैसा भर नहीं देगी, लेकिन तुम्हारे मन को बहलाने का काम करेगी।

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है?

पाँचवाँ भाग

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

माना जीवन में एक तुम्हारा साथी था। तुम और तुम्हारा वो साथी एक दुसरे से ऐसे आकर्षित थे जैसे लोहा और चुम्बक आकर्षित होते हैं। उस आकर्षण में तुम दोनों ऐसे पास आये की वो साथी तुम्हारे ह्रदय में समां गए। अर्थात, तुमने उस साथी को अपने मन में बसा लिया। और उस साथी के साथ जीवन का समय ऐसा कटा जैसे वीणा के तारों को मिलाकर बजाने पर एक मधुर गीत हो। उस साथी के साथ बिताया समय एक सुन्दर और मधुर गीत के सामान लगा और लगा की यही जीवन है। अगर वो साथी तुम्हारे जीवन से चले गए, तो ये सोच कर की वो लौट कर नहीं आएंगे, दुःख करने से कोई लाभ नहीं है। जब वो साथी लौट कर नहीं आने वाले, तो एक मन का साथी ढूंढ कर उसके साथ समय बिताना कब मना है?

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है?

छठा भाग

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है, हरिवंश राय बच्चन

अर्थ:

तुम्हारे जीवन में एक ऐसी परिस्थिति आ गयी और तुम्हारे प्यार का संसार टूट गया। वो परिस्थिति ऐसी थी जैसे आंधी की हवाएं और उस आंधी में तुम्हारे प्यार का आशियाना उजाड़ गया। और उस परिस्थिति में तुम कुछ नहीं कर पाए। तुमने शोर मचाया, और चीखे, मगर वो किसी काम नहीं आया। ऐसी परिस्थिति जैसे किसी बहुत प्यारे की मृत्यु हो गयी हो, तुम कितना भी रो लो, चीख लो, वो किसी काम नहीं आने वाला। ऐसी नाश की जो शक्ति है, उसके सामने किसी का ज़ोर नहीं चलता। किन्तु तुम एक मानव हो, और, निर्माण के प्रतिनिधि हो। मानव ने इस धरती पे अपने बल से निर्णाम किया है, और मानव ही निर्माण का कार्य कर सकता है, इसलिए मानव निर्माण का प्रतिनिधि है। तो निर्माण के प्रतिनिधि, हे मानव !, जो आज बसे हैं, वो प्रकृति के स्वभाव से बसते और उजड़ते हैं। लेकिन किसी उजड़े हुए को फिर से बसाने में कोई मनाही नहीं है।

रात अगर अंधेरी है, तो एक दिया जलाना कब मना है?

Read the Meaning in Hindi on our page dedicated to Hindi Language.

More About Great Poet Harivansh Rai Bachchan.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *