हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ शीर्षक से प्रसिद्ध यह कविता हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसकी रचना हिंदी के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल ने की थी। इस कविता में कवि ने बसंत ऋतु की हवाओं का चित्रण किया है, जो जीवन में नवीनीकरण और ऊर्जा का संचार करती हैं। कवि ने बसंत की हवाओं को मानवीय गुणों से सुसज्जित किया है, जैसे कि वे स्थिरता, नयापन और जीवन की उमंग का प्रतीक हैं।

कविता की भाषा सरल और सुगम है, जिसमें पंत ने प्रकृति के हर पहलू को जीवंत शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है। उनकी कविताओं की यह विशेषता है कि वे पाठकों को एक सजीव चित्रण के माध्यम से उस समय और स्थान पर ले जाती हैं जहाँ वे स्वयं उपस्थित होते हैं। ‘हवा हूँ हवा, मैं बसंती हवा हूँ’ में भी इस शैली का प्रभाव देखा जा सकता है।

कविता की एक अन्य प्रमुख विशेषता इसका लयबद्धता है, जो इसे सुनने में अत्यंत मधुर और गेय बनाती है। पंत ने अपनी कविता में शब्दों का चयन और उनका संयोजन इस प्रकार किया है कि वे एक संगीतमय प्रवाह में ढल जाते हैं। यह कविता न केवल एक साहित्यिक रचना है, बल्कि यह एक भावनात्मक अनुभव भी है, जो पाठकों को बसंत की हवाओं की तरह मुक्त और ताजगी भरा एहसास कराती है।

हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ कविता

हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।

सुनो बात मेरी –
अनोखी हवा हूँ।
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!        

जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं –
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं।
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै
बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में ‘कू’,
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची –
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।       

पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी –
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा –
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!


~केदारनाथ अग्रवाल

कविता का सारांश

कविता “हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ” में कवि ने बसंती हवा की स्वतंत्रता को व्यक्त किया है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में हवा की तुलना एक स्वतंत्र आत्मा से की गई है, जो बिना किसी बंधन के निरंतर बहती रहती है। यह हवा बसंत ऋतु की है, जो न केवल मौसम में परिवर्तन लाती है बल्कि नई ऊर्जा और जीवन का संचार करती है।

कविता “हवा हूँ हवा, मैं बसंती हवा हूँ” के प्रमुख विषयों में हवा की स्वतंत्रता, उसकी मस्ती और बसंत ऋतु के सौंदर्य का उल्लेख है। इस कविता में हवा को एक स्वतंत्र और मस्तमौला तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हवा का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसकी स्वतंत्रता है। यह किसी बंधन में नहीं बंधती और अपनी मर्जी से हर दिशा में बहती है। इसी स्वतंत्रता को कवि ने अपनी कविता में बखूबी दर्शाया है। हवा का यह गुण मनुष्य को जीवन में स्वतंत्रता का महत्व समझाता है और उसे भी खुल कर जीने की प्रेरणा देता है।

इसके साथ ही, हवा की मस्ती और चंचलता भी कविता का एक प्रमुख विषय है। हवा का हरकत करना, पेड़ों की पत्तियों को हिलाना, फूलों की खुशबू को फैलाना, यह सब उसकी मस्ती की निशानी हैं। यह मस्ती न केवल हवा की स्वाभाविकता को दर्शाती है, बल्कि जीवन में भी उमंग और उल्लास का प्रतीक है।



About the Author

Categories:

error:
Scroll to Top