अंधेरे का दीपक (है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?) एक आशावादी कविता है। ये हरिवंश राय बच्चन की एक उत्कृष्ट कविता है जो निराशा के समय में किसी में भी उत्साह और आशा भरने के लिए पर्याप्त है। यहाँ पर अँधेरे का अर्थ है ऐसा समय जब आपकी आशा या कल्पना टूट चुकी है। आपकी कल्पना में कुछ बड़ा था, कुछ विशिस्ट था, वो पूरा नहीं हो पाया। ऐसे समय में एक छोटी सी आशा, एक साधारण सी कल्पना करने में क्या बुरा है ?

अँधेरे का दीपक कविता का संपूर्ण भाव ये है के, निराशा की घड़ी में एक आशा करने में कोई बुराई नहीं है। कोई मनाही नहीं है। एक एक करके हम इस कविता की पंक्तियों की व्याख्या करेंगे तो हमे समझ आएगा की बच्चन जी इस कविता के माध्यम से का कहना चाहते हैं।

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अंधेरे का दीपक कविता

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

अँधेरे का दीपक कविता का अर्थ / अँधेरे का दीपक कविता व्याख्या

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

यहाँ कवी हरिवंशराय बच्चन कहना चाहते हैं के तुमने अपनी कल्पना में एक कमनीय, अर्थात मन को अत्यंत प्रसन्न करने वाला एक मंदिर रुपी घर बनाया था। तुमने अपनी भावनाओं से उसका विस्तार किया था। तुमने उसका हर कोना अपनी भावनाओं से बनाया था।

तुम्हारे इस स्वप्न ने उसे बहुत रूचि से संवारा था। तुमने अपने स्वप्न में उसे ऐसे रंगों से सजाया था, जो आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। मानो वो स्वर्ग से लाये गए हों। लेकिन किसी कारणवस वो बहुत सुन्दर कल्पनाओं के मंदिर ढह गया, टूट गया। वो एक मनमोहक मंदिर का स्वप्न टूट गया। ऐसे में ईंट, कंकर, और पत्थरों को जोड़ कर एक कुटिया, जिसमे शांति हो, का निर्माण करना कब मना है ?

रात अँधेरी है पर दीपक जलना कब मना है ?

अर्थात एक बहुत बड़ा स्वप्न अगर टूट गया है तो, उसके लिए निराश होने से बेहतर है एक छोटा स्वप्न जो पूरा हो सके , ऐसा स्वप्न देखना मना नहीं है। निराश होने से अच्छा है , एक छोटी सी आशा का मन में लाना। वो छोटी सी आशा ही वो अंधेरे का दीपक है।

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

यहाँ एक ऐसे पात्र या बर्तन की कल्पना है जो अत्यंत सुन्दर हो। ऐसा की वो बारिश के बाद का साफ़ नीला आसमान हो। बारिश के बाद स्वक्ष आकाश जैसा नीला होता है, ऐसे सुन्दर रंग से बना एक मधु का पात्र, जो देखने में मनमोहक है और मन को प्रसन्न करने वाला है। उस मधु घट में ऐसी सुन्दर लाल मदिरा है , जैसी सुबह की पहली किरण की लाली होती है। और वो लाल मदिरा उस घट में उसी प्रकार है जैसे सुबह की प्रथम किरण नए बदलो में समाती है।

ऐसी सुन्दर कल्पना जैसा मधु पात्र, और ऐसी सुन्दर लाल मदिरा जिसमे भरी हो, अगर वो टूट गया, तो दोनों हाथ की हथेली मिलकर, एक निर्मल श्रोत से अपनी प्यास बुझा लेना मना नहीं है।

रात अँधेरी है तो इसमें एक आशा का दीपक जलना मना नहीं है।

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

यहाँ पे कवी सुखद बीते हुए समय को याद करता है। एक ऐसा समय जब किसी तरह की चिंता नहीं थी। वो ऐसा समय जब दुःख तो दूर, उसकी परछाई भी पास नहीं आयी थी। उस समय में इतनी ख़ुशी थी के आँखों से और बातों से मस्ती टपकती थी। और हसी ऐसी के बादलों की गड़गड़ाहट भी फीकी पड़ गयी हो। और इस कारन से मानो बादलों को भी शर्म का एहसास हो।

जब मनुष्य का अच्छा समय होता है तो ऐसा ही होता है। मन आत्मविश्वास से भरा होता है, आँखों में और बातों में मानो खुसी झलकती हो। और उस समय मनुष्य अपना दिल खोल के हसता है। मगर किसी के भी जीवन में अच्छा समय सदा नहीं रहता।

वो अच्छा समय चला गया, या बीत गया, और सारे ख़ुशी के आधार लेकर चला गया। लेकिन अगर हम जानते हैं की समय अस्थिर है और समय एक सा नहीं रहता तो, समय की इस प्रकृति पे मुस्कुराना मना नहीं है।

वो हसी, वो उल्लास भले न हो, मुस्कुराने में कोई बुराई नहीं है।

रात की निराशा है तो एक आशा का दीपक जलना मना नहीं है।

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

कवी यहाँ कहना चाहते हैं की एक ऐसा समय भी था की मन अपनी मस्ती में था। मन की इस मस्ती में राग जगा था। मन की इस मस्ती में संसार के वैभवों को भी ठुकरा दिया था। संसार की वैभवों से आँखें मोड़ के, गीत गाने का वरदान माँगा था। ऐसा गान जो एक के मन से पैदा (ध्वनित) होकर दूसरों के मन तक पहुँचता हो। और ये गान ऐसे निरंतर ध्वनित होकर हर तरफ फ़ैल गया। इस मन को आनंदित, पागल करने वाले गीत को गा-गा कर पूरे आकाश और धरती को भर दिया था।

अब उस मन की मस्ती का अंत हो गया। अब उन गीतों का अंत हो गया, तो मन को बहलाने के लिए, किसी अधूरी पंक्ति का गुनगुनाना मना नहीं है।

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

हाय! एक समय था जब साथी ऐसे पास आये थे जैसे लोहा चुम्बक के पास आता है। वो ऐसे पास आये के ह्रदय में समा गए। उनके साथ दिन ऐसे कटते थे जैसे कोई वीणा के तारों पे, जीवन के प्यारा गाता हो। उन दोस्तों, साथियों के साथ ऐसा प्रतीत होता था जैसे यही जीवन है, और जीवन इतना प्यारा है। लेकिन समय के साथ वो साथी बिछड़ जाते हैं।

ऐसे साथी के बिछड़ जाने पर, ये सोच कर निराश होने से के वो साथी अब लौट कर नहीं आएंगे, एक मन का मीत ढूंढकर, उससे मित्रता, प्रेम करने में कोई मनाही नहीं है।

निराशा के अँधेरे में एक आशा का दीपक जलना मना नहीं है।

हमारे जीवन में यही होता है, जीवन के अलग अलग पड़ाव पे अलग अलग लोग मिलते हैं। हम उनके साथ अच्छा समय व्यतीत करते हैं, और मन में कहीं सोचते हैं के ये समय नहीं बीतेगा। परन्तु, समय के साथ सब बदल जाता है। ऐसे समय में निराश होने से अच्छा है,

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

~ हरिवंशराय बच्चन

एक प्यार का आशियाना, एक प्यार से भरा घर था। ऐसी हवाएं चली के वह प्यार का आशियाना उजड़ गया। और उस समय शोर मचाना या हल्ला करना किसी काम नहीं आया। परन्तु, विनाश की शक्तियों पे किसका ज़ोर चलता है? किन्तु हे मानव! तुम तो निर्माण के प्रतिनिधि हो। तुम निर्माण कर सकते हो।

तो हे मानव! हे निर्माण के प्रतिनिधि! तुम्हे ही बताना होगा, के लोग या घर, पर्कृति के नियम से उजड़ते हैं। और प्रकृति के ये नियम जड़ है, अर्थात ये कोई बदल नहीं सकता, ये प्रकृति के नियम कोई भेद-भाव नहीं करते। फिर जब तुम्हे ये बात पता है, तो बताओ, के किसी उजड़े हुए को फिर से बसना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

अँधेरे का दीपक कविता सारांश

अँधेरे का दीपक कविता “हरिवंश राय बच्चन” की आशावादी सोच को दर्शाती है। ये कविता मानुष के जीवन को आशा से भरती है। इसकी हर पंक्ति ये दर्शाती है, के एक निराशा का कारण है, परन्तु निराशा में डूब जाने से अच्छा है एक छोटी सी आशा का निर्माण करना।

बड़े सपने टूट जाते हैं। बड़ी सफलता हमेशा नहीं मिलती, परन्तु एक छोटी सी सफलता की आशा करने में कोई बुराई नहीं है। बड़ी ख़ुशी नहीं मिले तो कोई बात नहीं, उस बड़ी ख़ुशी की निराशा से बेहतर है, छोटी छोटी खुशियों की आशा करना।

समय हमेशा एक सा नहीं रहता, अच्छा समय जाता है, बुरा समय आता है, फिर बुरा समय भी चला जाता है। ये तो सब जानते हैं। तो बुरे समय में भी आशा रखना बेहतर है, न की निराशा में डूब जाना।

हम अगर आज के समाज में देखें तो लोग निराशा में डूब कर आत्महत्या तक कर लेते हैं। ये कविता एक प्रेरणा है, जीवन को जीने की। जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की।

एक ऐसी ही कविता है हरिवंश राय बच्चन जी जो आपको प्रेरणा से भर देगी : नीड़ का निर्माण फिर-फिर

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