रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 3 । कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की कहानी

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 3. इस भाग में हम कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की कहानी पढ़ेंगे। रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में कैसे कर्ण की अवहेलना होती है और कैसे दुर्योधन सबके सामने कर्ण का समर्थन करता है। हम जानेनेगें की दुर्योधन ने कर्ण से कैसे मित्रता की और कर्ण दुर्योधन का परम मित्र कैसे बना? कैसे कर्ण अंग देश का राजा बना और क्यूँ कर्ण को अंगराज कहते हैं?

ये हमारी वेबसाइट [ThePoemStory] पर रश्मिरथी कविता का तीसरा भाग है। हमने पढ़ने की सुविधा से इसे भागों में बांटा है। पहले दो भाग में हमने कर्ण के जन्म की कहानी देखि और फिर देखा की कैसे कर्ण अर्जुन की सभा में आया और अर्जुन को प्रतिस्पर्धा के लिए ललकारा। लेकिन वो एक सूतपुत्र था इसलिए उसे अर्जुन से प्रतियोगिता करने से रोका गया। उससे ये कहा गया की वो एक शूद्र है और अर्जुन एक राजपुत्र है, और एक राजपुत्र एक शूद्र के साथ प्रतियोगिता नहीं कर सकता है।

पिछले भाग भी पढ़ें:

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 2

आइये इस भाग में हम देखते हैं के कैसे दुर्योधन ने कर्ण का समर्थन किया और उससे मित्रता की।

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 3 कविता के बोल

कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की कहानी

कृपाचार्य ने कहा ‘ वृथा तुम क्रुद्ध हुए जाते हो,
साधारण-सी बात, उसे भी समझ नहीं पाते हो।
राजपुत्र से लड़े बिना होता हो अगर अकाज,
अर्जित करना तुम्हें चाहिये पहले कोई राज।’

कर्ण हतप्रभ हुआ तनिक, मन-ही-मन कुछ भरमाया,
सह न सका अन्याय , सुयोधन बढ़कर आगे आया।
बोला-‘ बड़ा पाप है करना, इस प्रकार, अपमान,
उस नर का जो दीप रहा हो सचमुच, सूर्य समान।

‘मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का,
धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का?
पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर,
‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर क्रूर।

‘किसने देखा नहीं, कर्ण जब निकल भीड़ से आया,
अनायास आतंक एक सम्पूर्ण सभा पर छाया।
कर्ण भले ही सूत्रोपुत्र हो, अथवा श्वपच, चमार,
मलिन, मगर, इसके आगे हैं सारे राजकुमार।

‘करना क्या अपमान ठीक है इस अनमोल रतन का,
मानवता की इस विभूति का, धरती के इस धन का।
बिना राज्य यदि नहीं वीरता का इसको अधिकार,
तो मेरी यह खुली घोषणा सुने सकल संसार।

‘अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक पर धरता हूँ।
एक राज्य इस महावीर के हित अर्पित करता हूँ।’
रखा कर्ण के सिर पर उसने अपना मुकुट उतार,
गूँजा रंगभूमि में दुर्योधन का जय-जयकार।

कर्ण चकित रह गया सुयोधन की इस परम कृपा से,
फूट पड़ा मारे कृतज्ञता के भर उसे भुजा से।
दुर्योधन ने हृदय लगा कर कहा-‘बन्धु! हो शान्त,
मेरे इस क्षुद्रोपहार से क्यों होता उद्भ्रान्त?

‘किया कौन-सा त्याग अनोखा, दिया राज यदि तुझको!
अरे, धन्य हो जायँ प्राण, तू ग्रहण करे यदि मुझको ।’
कर्ण और गल गया,’ हाय, मुझ पर भी इतना स्नेह!
वीर बन्धु! हम हुए आज से एक प्राण, दो देह।

‘भरी सभा के बीच आज तूने जो मान दिया है,
पहले-पहल मुझे जीवन में जो उत्थान दिया है।
उऋण भला होऊँगा उससे चुका कौन-सा दाम?
कृपा करें दिनमान कि आऊँ तेरे कोई काम।’

घेर खड़े हो गये कर्ण को मुदित, मुग्ध पुरवासी,
होते ही हैं लोग शूरता-पूजन के अभिलाषी।
चाहे जो भी कहे द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्या अभिमान,
जनता निज आराध्य वीर को, पर लेती पहचान।

लगे लोग पूजने कर्ण को कुंकुम और कमल से,
रंग-भूमि भर गयी चतुर्दिक् पुलकाकुल कलकल से।
विनयपूर्ण प्रतिवन्दन में ज्यों झुका कर्ण सविशेष,
जनता विकल पुकार उठी, ‘जय महाराज अंगेश।

‘महाराज अंगेश!’ तीर-सा लगा हृदय में जा के,
विफल क्रोध में कहा भीम ने और नहीं कुछ पा के।
‘हय की झाड़े पूँछ, आज तक रहा यही तो काज,
सूत-पुत्र किस तरह चला पायेगा कोई राज?’

दुर्योधन ने कहा-‘भीम ! झूठे बकबक करते हो,
कहलाते धर्मज्ञ, द्वेष का विष मन में धरते हो।
बड़े वंश से क्या होता है, खोटे हों यदि काम?
नर का गुण उज्जवल चरित्र है, नहीं वंश-धन-धान।

‘सचमुच ही तो कहा कर्ण ने, तुम्हीं कौन हो, बोलो,
जनमे थे किस तरह? ज्ञात हो, तो रहस्य यह खोलो?
अपना अवगुण नहीं देखता, अजब जगत् का हाल,
निज आँखों से नहीं सुझता, सच है अपना भाल।

कृपाचार्य आ पड़े बीच में, बोले ‘छिः! यह क्या है?
तुम लोगों में बची नाम को भी क्या नहीं हया है?
चलो, चलें घर को, देखो; होने को आयी शाम,
थके हुए होगे तुम सब, चाहिए तुम्हें आराम।’

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 3 कविता का अर्थ

कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की कहानी

कृपाचार्य ने कहा ‘ वृथा तुम क्रुद्ध हुए जाते हो,
साधारण-सी बात, उसे भी समझ नहीं पाते हो।
राजपुत्र से लड़े बिना होता हो अगर अकाज,
अर्जित करना तुम्हें चाहिये पहले कोई राज।’


कर्ण हतप्रभ हुआ तनिक, मन-ही-मन कुछ भरमाया,
सह न सका अन्याय , सुयोधन बढ़कर आगे आया।
बोला-‘ बड़ा पाप है करना, इस प्रकार, अपमान,
उस नर का जो दीप रहा हो सचमुच, सूर्य समान।

कर्ण ने जब अर्जुन को प्रतियोगिता के लिए ललकारा और उससे उसकी जाती पूछी गयी तो कर्ण क्रोधित हो गया। तभी गुरु कृपाचार्य ने कर्ण से कहा की कर्ण का क्रोध व्यर्थ है। ये एक साधारण सी बात है और तुम्हे ये समझ क्यूँ नहीं आता के अगर तुम्हे एक राजपुत्र से प्रतियोगिता करनी है तो तुम्हे कोई राज्य अर्जित कर्ण चाहिए। अगर तुम सोचते हो की एक राजपुत्र से नहीं लड़ोगे तो तुम्हारा कोई कार्य सिद्ध नहीं होगा तो पहले कोई राज्य अर्जित करो।

कृपाचार्य की बात सुन कर कर्ण थोड़ा परेशान हुआ और उसके मन में थोड़ा भ्रम हुआ। कर्ण को हतोत्साहित होता देख और कर्ण के प्रति होते अन्याय को दुर्योधन नहीं सह सका और कर्ण के समर्थन में बढ़कर आगे आया। दुर्योधन बोला “ऐसे मनुष्य का जो सूर्य के सामान प्रज्वलित दीखता हो, इस प्रकार अपमान करना पाप के समान है”।

‘किसने देखा नहीं, कर्ण जब निकल भीड़ से आया,
अनायास आतंक एक सम्पूर्ण सभा पर छाया।
कर्ण भले ही सूत्रोपुत्र हो, अथवा श्वपच, चमार,
मलिन, मगर, इसके आगे हैं सारे राजकुमार।

‘करना क्या अपमान ठीक है इस अनमोल रतन का,
मानवता की इस विभूति का, धरती के इस धन का।
बिना राज्य यदि नहीं वीरता का इसको अधिकार,
तो मेरी यह खुली घोषणा सुने सकल संसार।

दुर्योधन आगे बोलता है “किसने नहीं देखा की कर्ण जब इस सभा में भीड़ से निकल कर आया, तो इस संपूर्ण सभा पर एक आतंक और डर बिना किसी कारण के छा गया। ये कर्ण भले ही किसी भी नीची जाती का हो, सूतपुत्र हो चमार जाती का हो, लेकिन इसकी आभा के आगे सारे राजकुमार मलिन हैं। क्या ऐसे वीर और मनुष्य रुपी अनमोल रतन का अपमान कर्ण उचित है? क्या उचित है ऐसे धरती के धन और मानवता की एक विभूति का अपमान करना?”

इसके बाद दुयोधन एक घोषणा करता है “यदि कर्ण की वीरता का प्रमाण किसी राज्य के राजा बनाने से सिद्धा होता है, तो मैं ये घोषणा करता हूँ, और इस घोसना को सारा संसार कान खोल कर सुन ले।”

दुर्योधन ने कर्ण से कैसे मित्रता की

‘अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक पर धरता हूँ।
एक राज्य इस महावीर के हित अर्पित करता हूँ।’
रखा कर्ण के सिर पर उसने अपना मुकुट उतार,
गूँजा रंगभूमि में दुर्योधन का जय-जयकार।

कर्ण चकित रह गया सुयोधन की इस परम कृपा से,
फूट पड़ा मारे कृतज्ञता के भर उसे भुजा से।
दुर्योधन ने हृदय लगा कर कहा-‘बन्धु! हो शान्त,
मेरे इस क्षुद्रोपहार से क्यों होता उद्भ्रान्त?

अंग देश का मुकुट कर्ण के मस्तक पर रखता हूँ, अर्थात: मैं कर्ण को अंग देश का राज्य सौंपता हूँ। ये एक राज्य मैं कर्ण जैसे वीर के हिट के लिए अर्पित करता हूँ। ये कह कर दुर्योधन ने अपने सर का मुकुट उतार कर कर्ण के सर पे रख दिया। जब दुर्योधन ने ऐसा किया तो पूरी रंगभूमि दुर्योधन का जयकार घोष करने लगी।

दुर्योधन के इस कार्य से कर्ण अचम्भे में पड़ गया। दुर्योधन ने उसपे परम कृपा की थी जिसकी उसको को आशा नहीं थी, इसलिए वो चकित रह गया। उसने दुर्योधन को अपनी बाहों में भर लिया और दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता से उसका ह्रदय भर आया। तब दुर्योधन ने कर्ण को ह्रदय से लगा कर बोला “हे बंधू! शांत हो जाओ, मैंने एक छोटा सा उपहार मात्र दिया है, ऐसे छोटे उपहार के लिए क्यूँ इतना चकित होते हो?

कैसे कर्ण अंग देश का राजा बना

‘किया कौन-सा त्याग अनोखा, दिया राज यदि तुझको!
अरे, धन्य हो जायँ प्राण, तू ग्रहण करे यदि मुझको ।’
कर्ण और गल गया,’ हाय, मुझ पर भी इतना स्नेह!
वीर बन्धु! हम हुए आज से एक प्राण, दो देह।

‘भरी सभा के बीच आज तूने जो मान दिया है,
पहले-पहल मुझे जीवन में जो उत्थान दिया है।
उऋण भला होऊँगा उससे चुका कौन-सा दाम?
कृपा करें दिनमान कि आऊँ तेरे कोई काम।’

तुझको एक राज्य देकर मैंने ऐसा कौन सा अनोखा त्याग कर दिया? मेरे प्राण तो तब धन्य हो जाएंगे अगर तुम मुझको स्वीकार कर लो। एक राज्य कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, परन्तु मैं धन्य हो जाऊँगा अगर तुम मेरी मित्रता स्वीकार कर लो। दुर्योधन की ये बात सुनकर कर्ण दुर्योधन के प्रति प्रेम और कृतज्ञता से और भर गया और बोला, “मुझपे भी भला कोई इतना प्रेम बरसा सकता है? और कहता है “हे वीर मित्र! हम आज से दो शरीर भले ही हों, परन्तु हमारे प्राण एक रहेंगे।

इस भरी सभा में तुमने मुझे सम्मान दिया है ये मेरे जीवन में पहली बार है। ये पहली बार है जो तुमने मुझे एक ऊंचा पद दिया है। ये एक प्रकार का ऋण (क़र्ज़) है, और इस क़र्ज़ से कौन सा दाम चूका के मैं मुक्त हो पाऊंगा ? मुझपे कृपा करो के मैं किसी दिन तुम्हारे किसी काम आ सकूँ।

कर्ण का जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। वो था तो कुंती और सूर्य का पुत्र, किन्तु, कुंती ने उसका त्याग कर दिया था और उसका पालन पोषण एक सारथी ने किया था। बचपन से कर्ण वीर और महत्वाकांक्षी था परन्तु समाज उसको शूद्र या सूतपुत्र कह के उसकी अवहेलना करता था। उसकी वीरता को लोग अनदेखा कर देते थे अथवा उसे ये बोल कर हतोत्साहित करते थे की एक शूद्र का पुत्र, अस्त्र शस्त्र नहीं चला सकता। ये पहली बार था की दुर्योधन ने उसका सम्मान किया था।

ये है कर्ण और दुर्योधन की मित्रता की कहानी। दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया और उससे मित्रता का प्रस्ताव भी रखा। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला ये की, दुर्योधन की मन में पांडवों की लिए बैर था और कर्ण की वीरता देख कर उसने उसे अपना मित्र बना लिया। ये उसने ऐसा इसलिए किया की आगे चलकर अगर ज़रुरत पड़े तो वो कर्ण जैसे वीर का सहारा लेकर पांडवों से युद्ध कर सके। दूसरा पहलु ये है की सच में उसने कर्ण की प्रति अनादर के विरुद्ध कर्ण का साथ दिया। कारण चाहे कुछ भी हो, कर्ण ने अपनी मित्रता सारा जीवन दुर्योधन की प्रति कृतज्ञ रहकर निभाया।

रश्मिरथी में ही हम जानेंगे की कैसे कर्ण ने दुर्योधन की मित्रता के लिए स्वर्ग का सिंघासन तक त्याग दिया।

क्यूँ कर्ण को अंगराज कहते हैं

घेर खड़े हो गये कर्ण को मुदित, मुग्ध पुरवासी,
होते ही हैं लोग शूरता-पूजन के अभिलाषी।
चाहे जो भी कहे द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्या अभिमान,
जनता निज आराध्य वीर को, पर लेती पहचान।

लगे लोग पूजने कर्ण को कुंकुम और कमल से,
रंग-भूमि भर गयी चतुर्दिक् पुलकाकुल कलकल से।
विनयपूर्ण प्रतिवन्दन में ज्यों झुका कर्ण सविशेष,
जनता विकल पुकार उठी, ‘जय महाराज अंगेश।

ये सब देख कर सारी जनता कर्ण को घेर कर खड़ी हो गयी। वहां पे मौजूद सभी लोग कर्ण के प्रभाव से मुग्ध और प्रसन्न थे। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं के लोग शूरता-पूजन के अभिलाषी होते हैं। अर्थात, लोग वीरों की पूजा करने के इक्षुक होते हैं। चाहे कारण कोई भी हो, द्वेष, झूठा अभिमान, जनता अपने पूजनीय वीर को पहचान लेती है और उसकी पूजा की अभिलाषी होती है।

लोग कर्ण को कुमकुम और कमल से पूजने लगे, और सारी रंगभूमि चारो दिशाओं से आने वाली प्रसन्नता के शोर से भर गयी। जनता की इस प्रतिक्रिया को देख कर कर्ण उनके सामने शीश झुकता है, और जैसे ही वो अपना शीश झुकता है, सारी जनता उद्घोष करती है “जय महाराज अंगेश!”(अंग देश के महाराज की जय )

अंग देश का राजा बनने के कारण कर्ण को अंगेश अथवा अंग्रेज कर्ण भी बोला जाता है। तो हम अब जानते हैं के क्यूँ कर्ण को अंगराज कहते हैं और कैसे कर्ण अंग देश का राजा बना।

‘महाराज अंगेश!’ तीर-सा लगा हृदय में जा के,
विफल क्रोध में कहा भीम ने और नहीं कुछ पा के।
‘हय की झाड़े पूँछ, आज तक रहा यही तो काज,
सूत-पुत्र किस तरह चला पायेगा कोई राज?’

दुर्योधन ने कहा-‘भीम ! झूठे बकबक करते हो,
कहलाते धर्मज्ञ, द्वेष का विष मन में धरते हो।
बड़े वंश से क्या होता है, खोटे हों यदि काम?
नर का गुण उज्जवल चरित्र है, नहीं वंश-धन-धान।

जब जनता ने कर्ण को महाराज अंगेश कह कर सम्बोधित किया तो ये बात भीम के ह्रदय में तीर की तरह चुभ गया। जब भीम के समझ में कुछ नहीं आया तो वह क्रोध में बोला, आज तक घोड़ों की पूँछ ही साफ़ करते आये हो, यही तुम्हारा काम रहा है। तुम एक सूत-पुत्र कैसे कोई राज्य चला सकोगे?

तब दुर्योधन ने कहा के भीम! झूठ में बिना मतलब की बात कर रहे हो। तुम तो धर्म के ज्ञाता कहलाते हो, फिर भी द्वेष और जलन रुपी विष को अपने मन में रखते हो! बड़े वंश से कुछ नहीं होता अगर आचरण और कार्य छोटा हो। किसी भी मनुष्य का गुण उसका उज्जवल चरित्र होता है, उसका वंश और उसकी धन संपत्ति नहीं।

‘सचमुच ही तो कहा कर्ण ने, तुम्हीं कौन हो, बोलो,
जनमे थे किस तरह? ज्ञात हो, तो रहस्य यह खोलो?
अपना अवगुण नहीं देखता, अजब जगत् का हाल,
निज आँखों से नहीं सुझता, सच है अपना भाल।

कृपाचार्य आ पड़े बीच में, बोले ‘छिः! यह क्या है?
तुम लोगों में बची नाम को भी क्या नहीं हया है?
चलो, चलें घर को, देखो; होने को आयी शाम,
थके हुए होगे तुम सब, चाहिए तुम्हें आराम।’

दुर्योधन भीम से आगे कहता है की कर्ण ने तो सच ही तो कहा है, तुम कौन हो और तुम्हारा जन्म कैसे हुआ था? हो सके तो ये सबको बताओ। अगर तुम जानते हो तो ये रहस्य भी खोलो। ऐसा ही है इस जगत का हाल के किसी को अपना अवगुण नहीं दिखाई देता है। ठीक उसी प्रकार से जैसे, अपनी ही आँखों को अपना मस्तिष्क या ललाट दिखाई नहीं देता।

दुर्योधन जानता था की पांडवों का जन्म कुंती को मिले वरदान से हुआ था। भीम स्वयं पवन देवता का पुत्र था। कर्ण, कुंती और सूर्य का पुत्र था, परन्तु कर्ण के जन्म के समय कुंती अविवाहित थी इसलिए, उसने कर्ण का त्याग कर दिया था। अभी तक ये बात कुंती के अलावा कोई नहीं जानता था।

रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’

वीर कर्ण के लिए एक कविता

भाइयों को आपस में बहस करते और एक दुसरे पे कीचड़ उछालते देख कृपाचार्य बीच में बोले, ये क्या है? क्या तुमलोगों में बिलकुल भी शर्म नहीं है? चलो अब शाम होने को आयी है, अब घर को चलते हैं। तुम सब थक गए होगे, अब तुम्हे आराम करना चाहिए।



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