रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1 | वीर कर्ण का परिचय एवं जन्म कथा

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1. वीर कर्ण का परिचय एवं जन्म कथा। इस भाग में हम पढ़ेंगे कि कर्ण का जन्म कैसे हुआ और उनके जन्म पर क्या हुआ था।

ये रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखी गई खूबसूरत पंक्तियां हैं और कर्ण के जन्म के साथ-साथ समाज पर व्यंग्य भी करती हैं. उनका पूरा उद्देश्य यह कहना है कि उच्च आत्माओं और उच्च मूल्य वाले व्यक्ति को उसके जन्म से उस समाज में नहीं पहचाना जाना चाहिए जिसमें वह पैदा हुआ है। बल्कि उनकी प्रतिभा की सराहना की जानी चाहिए.

रश्मिरथी का प्रथम सर्ग वीर कर्ण के जीवन की उस पहली झलक से आरंभ होता है, जहाँ दिनकर केवल एक महाभारतीय पात्र का परिचय नहीं देते, बल्कि एक ऐसे मनुष्य की कथा उठाते हैं जो जन्म से ही संघर्ष का प्रतीक बन जाता है। इस भाग में कवि “जय हो” के उद्घोष के साथ तेज, बल, दया, धर्म और तप-त्याग जैसे मूल्यों को नमन करते हुए यह स्थापित करते हैं कि महानता गोत्र या जाति से नहीं, बल्कि कर्म, चरित्र और साहस से जन्म लेती है। इसी भावभूमि पर कर्ण का प्रवेश होता है—सूर्यपुत्र, कुंती का प्रथम पुत्र, जिसे सामाजिक भय के कारण त्याग दिया गया, लेकिन जो सूत-वंश में पलकर भी अद्भुत पराक्रम, दानवीरता और आत्मसम्मान का जीवंत उदाहरण बन गया। यह सर्ग कर्ण के जन्म, त्याग और तेजस्वी व्यक्तित्व की नींव रखता है—और साथ ही पाठक को उस दृष्टि के लिए तैयार करता है, जिसमें कर्ण केवल “योद्धा” नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और प्रतिभा का संघर्षशील प्रतीक बन जाता है।

रश्मिरथी श्रृंखला

रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1

रश्मिरथी कविता की पंक्तियाँ | प्रथम सर्ग (भाग 1)

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी’ के प्रथम सर्ग का यह भाग वीर कर्ण के तेज, तप, साहस और संघर्ष की भूमिका रचता है। इन पंक्तियों में कवि यह स्थापित करते हैं कि सम्मान जाति-गोत्र से नहीं, बल्कि कर्म, चरित्र और पुरुषार्थ से अर्जित होता है।

‘जय हो, जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।
किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल,
सुधी खोजते नहीं गुणों का आदि, शक्ति का मूल।
 
ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग,
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।
 
जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुई धार पर बहती हुई पिटारी।
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‍भुत वीर।
 
तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरूष का अभिमानी।
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास,
अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।
 
अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से,
कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से।
 निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर,
वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।
 
नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में,
अमित वार खिलते
वे पुर से दूर कुञ्ज-कानन में।
समझे कौन रहस्य? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल,
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े क़ीमती लाल।
 
जलद-पटल में छिपा, किन्तु, रवि कबतक रह सकता है?
युग की अवहेलना शूरमा कबतक सह सकता है?
पाकर समय एक दिन आखिर उठी जवानी जाग,
फूट पड़ी सबके समक्ष पौरूष की पहली आग।

~ Ramdhari Singh Dinkar

रश्मिरथी कविता का अर्थ | रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1

रश्मिरथी कविता का अर्थ


‘जय हो, जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।
किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल,
सुधी खोजते नहीं गुणों का आदि, शक्ति का मूल।

~ Ramdhari Singh Dinkar

दिनकर इन पंक्तियों में कहते हैं कि अग्नि जहाँ भी जलती है, वह पूजनीय है, क्योंकि अग्नि केवल आग नहीं—यह पवित्रता, ऊर्जा, तेज और साहस का प्रतीक है। ठीक वैसे ही, जिस मनुष्य के भीतर शौर्य, शक्ति और आत्मबल बसता है, वह सम्मान के योग्य होता है।
यहाँ कवि तेज, बल और वीरता को नमन करते हैं—क्योंकि यही गुण किसी व्यक्ति को महान बनाते हैं।

इसके बाद फूल का उदाहरण आता है। फूल चाहे जंगल के किसी वृक्ष की शाखा पर खिले या किसी सुंदर उपवन में—फूल की सुंदरता और उसकी गरिमा कम नहीं होती।
अर्थ स्पष्ट है—गुण जहाँ हों, वे सम्मान के अधिकारी होते हैं।


ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग,
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।

~ Ramdhari Singh Dinkar

इन पंक्तियों में दिनकर समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। उनके अनुसार वास्तविक विद्वान वही है जो ऊँच-नीच का भेद नहीं करता।
जो व्यक्ति मनुष्यों को जाति, कुल या वर्ग से नहीं—मानवता और गुणों से देखता है, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है।

कवि कहते हैं कि जिसके भीतर दया और धर्म हो, वही सबसे पूज्य है।
यहाँ “क्षत्रिय” और “ब्राह्मण” की परिभाषा भी दिनकर जन्म से नहीं, गुणों से करते हैं:

  • सच्चा क्षत्रिय वही है, जिसके भीतर निर्भयता की आग हो
  • श्रेष्ठ ब्राह्मण वही है, जो तपस्या और त्याग से भरपूर हो

अर्थात, सम्मान पद या जन्म से नहीं—चरित्र और कर्म से मिलता है।

यह विचार आगे बढ़कर स्पष्ट होता है कि प्रतिष्ठा गोत्र बताने से नहीं मिलती, बल्कि अपनी योग्यता और अपने कर्म से मिलती है। दुनिया भले ही किसी को उसके “मूल” के आधार पर सही या गलत कह दे, लेकिन वीर और प्रतिभावान लोग अपने कर्म से इतिहास में स्थान बना लेते हैं।


जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुई धार पर बहती हुई पिटारी।
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‍भुत वीर।

~ Ramdhari Singh Dinkar

जिनके पिता भगवान “सूर्य” और माता धर्मपरायण महिला “कुंती” थीं। पैदा होते ही उसे त्याग दिया गया। उनकी पहली जगह एक टोकरी थी जो नदी की धारा पर बह रही थी। (कर्ण को क्यों त्याग दिया गया – पढ़ें)

उन्हें सारथी के एक परिवार ने गोद लिया और उनका पालन-पोषण किया, और उन्होंने अपनी जन्म देने वाली माँ का दूध भी नहीं चखा। इसके विपरीत, कर्ण सभी योद्धाओं के बीच एक उत्कृष्ट योद्धा और बेहद बहादुर के रूप में विकसित हुआ।

यहाँ कवि कर्ण के जन्म की कथा को संकेत में बताते हैं। कर्ण सूर्यपुत्र थे और उनकी माता कुंती थीं। जन्म के तुरंत बाद ही उन्हें त्याग दिया गया, और उनका पहला पालना बना—नदी की धारा में बहती एक पिटारी

कर्ण को एक सारथी परिवार ने गोद लिया और पाला। वे अपनी जन्मदात्री माँ का दूध तक नहीं पी सके। इसके बावजूद, कर्ण आगे चलकर अद्भुत वीर, पराक्रमी और असाधारण योद्धा बनकर उभरे।


तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरूष का अभिमानी।
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास,
अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।

~ Ramdhari Singh Dinkar

इन पंक्तियों में कर्ण के व्यक्तित्व की सुंदर तस्वीर बनती है। कर्ण शरीर से समरशूर, भीतर से भावुक, और स्वभाव से दानशील थे।
वे जाति-गोत्र पर नहीं—शील और पुरुषार्थ पर गर्व करते थे।

समाज यदि उन्हें “सारथी का पुत्र” कहकर नीचा दिखाता भी था, तो कर्ण टूटते नहीं थे। वे अपनी मेहनत, अपनी साधना और अपने अभ्यास से आगे बढ़ते रहे।
दिनकर यहाँ यह भी बताते हैं कि कर्ण ने ज्ञान, ध्यान, शस्त्र और शास्त्र का सम्यक अभ्यास किया और अपने भीतर की क्षमता को स्वयं विकसित किया।
यानी कर्ण अपने चरित्र के निर्माता खुद थे—उन्होंने स्वयं अपने भीतर महानता गढ़ी।


अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से,
कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से।
 निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर,
वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।

~ Ramdhari Singh Dinkar

कर्ण ने नगर के शोर-गुल और भीड़ से दूर रहकर कठिन साधना की। उन्होंने एकांत में, पूरी एकाग्रता और परिश्रम के साथ अपने कौशल को निखारा।
दिनकर इस मेहनत को “वन्य कुसुम” के रूप में चित्रित करते हैं—जो दुनिया की नजरों से दूर जंगल में खिलता है, फिर भी उसकी सुंदरता और अस्तित्व पूर्ण होता है।


नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में,
अमित वार खिलते
वे पुर से दूर कुञ्ज-कानन में।
समझे कौन रहस्य? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल,
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े क़ीमती लाल।

~ Ramdhari Singh Dinkar

कवि कहते हैं कि फूल केवल राजाओं के उपवनों में ही नहीं खिलते। कई बार वे ऐसे स्थानों पर खिलते हैं, जिनसे कोई उम्मीद नहीं करता—घने जंगलों में, दूर-दराज़ के काननों में।

यही प्रकृति का रहस्य है—वह कई बार गुदड़ी में भी अनमोल रत्न रख देती है।
अर्थात, महानता का जन्म अक्सर वहीं होता है जहाँ समाज उसे देखने की उम्मीद नहीं करता।


जलद-पटल में छिपा, किन्तु, रवि कबतक रह सकता है?
युग की अवहेलना शूरमा कबतक सह सकता है?
पाकर समय एक दिन आखिर उठी जवानी जाग,
फूट पड़ी सबके समक्ष पौरूष की पहली आग।

~ Ramdhari Singh Dinkar

सूर्य बादलों के पीछे कितनी देर छिप सकता है? और एक वीर व्यक्ति कब तक उपेक्षा सह सकता है?
कवि कहते हैं कि एक दिन समय आता है जब प्रतिभा स्वयं अपना रास्ता बना लेती है।

ठीक उसी तरह, एक दिन कर्ण का यौवन जाग उठा। वह संसार के सामने आया—और उसके भीतर का पराक्रम पहली बार सबके सामने आग की तरह फूट पड़ा।
यह कर्ण के जीवन की शुरुआत है—एक ऐसा जीवन जो संघर्ष से जन्म लेता है और पराक्रम से इतिहास बनता है।


रश्मिरथी प्रथम सर्ग भाग 1 का सारांश

रश्मिरथी के प्रथम सर्ग (भाग 1) में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ वीर कर्ण का परिचय केवल एक महाभारतीय पात्र के रूप में नहीं कराते, बल्कि उसे एक ऐसे मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो जन्म से ही संघर्ष का प्रतीक बन जाता है। इस भाग में कुल 7 कविताएँ शामिल हैं, और इन सातों कविताओं के माध्यम से कवि एक बहुत बड़ी बात स्थापित करते हैं—कि व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, कुल या गोत्र से नहीं, बल्कि उसके गुण, कर्म और चरित्र से होती है।

दिनकर इस भाग की शुरुआत “जय हो” के उद्घोष के साथ करते हैं, जहाँ वे अग्नि को नमन करते हैं। यहाँ अग्नि केवल आग नहीं, बल्कि तेज, बल, साहस और शक्ति का प्रतीक है। कवि का संदेश स्पष्ट है—जिस प्रकार अग्नि जहाँ भी जले, वह पूजनीय होती है, उसी प्रकार जिस मनुष्य के भीतर तेज, वीरता और साहस होता है, वह सम्मान के योग्य होता है।
इसके साथ ही फूल का उदाहरण देकर दिनकर बताते हैं कि फूल चाहे जंगल के किसी वृक्ष पर खिले या किसी राजाओं के उपवन में, उसका सम्मान कम नहीं होता। यानी गुण जहाँ भी हों, वे आदर के पात्र हैं।

इसके बाद दिनकर जाति और ऊँच-नीच के भेद पर चोट करते हैं। कवि कहते हैं कि वही व्यक्ति श्रेष्ठ ज्ञानी है जो ऊँच-नीच का भेद नहीं मानता। जो इंसान दया और धर्म को अपनाता है, वही वास्तव में पूज्य है। यहाँ दिनकर “क्षत्रिय” और “ब्राह्मण” जैसी पहचान को जन्म से नहीं, बल्कि गुणों से जोड़ते हैं—

  • सच्चा क्षत्रिय वह है जिसके भीतर निर्भयता की आग हो,
  • और श्रेष्ठ ब्राह्मण वह है जिसमें तप और त्याग हो।

अर्थात, समाज को किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि उसके स्वभाव, साहस और आत्मबल के आधार पर पहचानना चाहिए।

इस भाग में दिनकर यह भी स्पष्ट करते हैं कि सम्मान मांगकर या गोत्र बताकर नहीं मिलता। सम्मान वहीं प्राप्त करता है जो अपने कर्म और सामर्थ्य से समाज को प्रभावित करता है। दुनिया चाहे किसी को उसके “मूल” के आधार पर कमतर समझे, लेकिन वीर लोग अपने पराक्रम से इतिहास में अपनी लीक खुद खींचते हैं। यही विचार इस पूरे सर्ग की आत्मा है—महानता खुद बनाई जाती है, विरासत में नहीं मिलती।

इसके बाद कवि कर्ण के जन्म और प्रारंभिक जीवन का संकेत देते हैं। कर्ण सूर्यपुत्र थे, माता कुंती थीं—लेकिन जन्म के साथ ही उन्हें त्याग दिया गया। उनका पालना बनती है नदी की धारा में बहती एक पिटारी। फिर वह सूत-वंश में पलते हैं और जननी का दूध तक नहीं चखते। लेकिन इसके बावजूद कर्ण में वह तेज जन्म से ही मौजूद है, जो उन्हें सभी युवकों में अद्भुत वीर बना देता है।

इस भाग का सबसे प्रेरक पहलू यह है कि दिनकर कर्ण को केवल “दुखद पात्र” नहीं बनाते। वे उसे एक ऐसा मनुष्य बनाते हैं जो अपने भीतर की कमी को अपनी साधना से भर देता है। कर्ण नगर के शोर से दूर, भीड़ से अलग होकर, तन-मन से अभ्यास करता है। शस्त्र, शास्त्र, ध्यान, ज्ञान—हर क्षेत्र में वह स्वयं को निखारता है। वह अपने गुणों का विकास अपने ही प्रयास से करता है।
दिनकर इस मेहनत को “वन्य कुसुम” की तरह बताते हैं—जो जंगल में अकेला खिलता है, लेकिन फिर भी उसकी सुंदरता और मूल्य कम नहीं होता।

इस प्रथम भाग का निष्कर्ष यही बनता है कि प्रकृति और जीवन दोनों कई बार अनमोल प्रतिभा को ऐसी जगह रख देते हैं जहाँ समाज की नज़र नहीं जाती। लेकिन सूर्य बादलों के पीछे हमेशा नहीं छिप सकता, और वीरता को हमेशा दबाया नहीं जा सकता। एक दिन समय आता है जब कर्ण जैसे व्यक्तित्व संसार के सामने आते हैं और उनका पुरुषार्थ सभी के सामने चमक उठता है।

सारांश रूप में कहा जाए तो यह भाग कर्ण के जीवन की भूमिका है—
जहाँ दिनकर हमें यह समझाते हैं कि महान बनने के लिए जन्म नहीं, गुण चाहिए, और गुण विकसित करने के लिए संघर्ष, साधना और आत्मविश्वास चाहिए। यही कारण है कि कर्ण का यह प्रयास रामधारी सिंह दिनकर की दृष्टि में उसे एक सम्मानित और प्रेरक स्थान दिलाता है।

पढ़ने के लिए धन्यवाद!


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