कोई पार नदी के गाता | हरिवंश राय बच्चन

कोई पार नदी के गाता हरिवंश राय बच्चन जी की एक कविता है जो शायद उनके जीवन से जुड़ी हुयी है। शायद अलाहाबाद में उनके घर में गंगा के पार से किसी गाने की ध्वनि आती होगी। इसे ही विषयवस्तु बना कर हरिवंशराय जी ने ये कविता लिखी होगी। जब आज की तरह टीवी या सोशल मीडिया, या ऐसे उपकरण नहीं थें जिसे लोग कानो में लगाकर संगीत सुन सकते हैं। तब लोग शाम को, अपने काम से थक कर संगीत का आनंद लेते थे।

या तो ये बच्चन जी के जीवन की सत्य घटना है, या ये एक कल्पना है, लेकिन दोनों में ही उन्होंने भावनाओं को व्यक्त करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है।

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कोई पार नदी के गाता कविता


भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर,
आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!

होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई
उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!

आज न जाने क्यों होता मन
सुनकर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता,
सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!

~ हरिवंश राय बच्चन

कोई पार नदी के गाता कविता का भावार्थ

ये जो रात का सन्नाटा है, जो रात की शान्ति है, इस शांति को तोड़ कर एक देहाती गाने की आवाज़ आती है। वो आवाज़ ककड़ी के खेतों से उठकर उस जामुन के पेड़ पर आकर लहराती है। इसका अर्थ है के वो आवाज़ हर कहीं छा जाती है। वो आवाज़ नदी के उस पार से आरा रही है। कोई नदी के उस पार जाता है।

जो वो गा रहा है, शायद सोचता होगा के नदी के इस पार, इस तट पे कोई उसके गाने का आनद ले रहा होगा।

शायद जब बच्चन जी ये कविता लिख रहे होंगे, उन्हें ये गान सुनते हुए थोड़ा समय बीत गया होगा, और एक दिन उन्होंने सोचा के जीवन के इस पल को कविता में लिखना चाहिए, और शायद तब उन्होंने इस कविता की आखिरी पंक्तियाँ लिखी होगी।
आज न जाने इस गाने को सुनकर ऐसा लगता है, की ये जो अकेलेपन का गाना है, मैं हमेशा इसे सुनता रहूं और हमेशा इसी तरह ये गाता रहता।

कोई पार नदी के गाता Quotes

कोई पार नदी के गाता

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কোঈ পার নদী কে গাতা!


ভংগ নিশা কী নীরবতা কর,
ইস দেহাতী গানে কা স্বর,
ককডী কে খেতোং সে উঠকর,
আতা জমুনা পর লহরাতা!
কোঈ পার নদী কে গাতা!

হোংগে ভাঈ-বংধু নিকট হী,
কভী সোচতে হোংগে যহ ভী,
ইস তট পর ভী বৈঠা কোঈ
উসকী তানোং সে সুখ পাতা!
কোঈ পার নদী কে গাতা!

আজ ন জানে ক্যোং হোতা মন
সুনকর যহ একাকী গাযন,
সদা ইসে মৈং সুনতা রহতা,
সদা ইসে যহ গাতা জাতা!
কোঈ পার নদী কে গাতা!

রাতের নিস্তব্ধতা, রাতের শান্তি, ভেঙ্গে যায় গ্রাম্য গানের শব্দে। সেই আওয়াজ শসার ক্ষেত থেকে ভেসে আসে এবং ব্ল্যাকবেরি গাছে ঢেউ তোলে। এর মানে হল যে শব্দটি সর্বত্র ছড়িয়ে পড়ে। নদীর ওপার থেকে সেই শব্দ ভেসে আসছে। কেউ চলে যায় নদীর ওপারে।

সে যাই গাইছে, সে হয়তো ভাবছে নদীর ওপারে, এই পাড়ে, কেউ হয়তো তার গান উপভোগ করছে।

সম্ভবত বচ্চনজি যখন এই কবিতাটি লিখছিলেন, তখন তিনি এই গানটি শুনে কিছুটা সময় কাটিয়েছিলেন এবং একদিন তিনি ভেবেছিলেন যে তাঁর জীবনের এই মুহূর্তটি একটি কবিতায় লেখা উচিত, এবং তখনই তিনি এর শেষ লাইনগুলি লিখতেন। কবিতা
আজ এই গানটি শোনার পর আমার মনে হচ্ছে আমি এই একাকীত্বের গানটি সবসময় শুনতে থাকব এবং সবসময় এভাবেই গাইতে থাকব।




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